क्या भाजपा के ‘चक्रव्यूह’ में फंसी कांग्रेस? निर्दलीय ‘बी टीम’ के सहारे बोर्ड बनाने की तैयारी!
बीकानेर. नगर निगम चुनाव में नामांकन प्रक्रिया पूरी होने और प्रत्याशियों को चुनाव चिह्न आवंटित होने के बाद सभी 80 वार्डों की तस्वीर लगभग साफ हो गई है। चुनावी मुकाबलों के बीच अब सबसे अधिक चर्चा कांग्रेस की अंदरूनी कलह और बड़ी संख्या में मैदान में उतरे निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका को लेकर हो रही है। राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस भाजपा के कथित ‘चक्रव्यूह’ में फंस गई है और क्या चुनाव परिणाम के बाद भाजपा तथा उसके बागी माने जा रहे निर्दलीय मिलकर नगर निगम का बोर्ड बनाएंगे?
दो दिन पहले शहर कांग्रेस अध्यक्ष के साथ हुई मारपीट ने पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। घटना का वीडियो सामने आने के बाद मामला बीकानेर से निकलकर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक चर्चा में आ गया। इसी बीच कांग्रेस नेताओं से संबंधित बताया जा रहा एक ऑडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। हालांकि वायरल ऑडियो की प्रामाणिकता की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस की चुनावी रणनीति और संगठनात्मक एकजुटता पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मतदान से ठीक पहले सामने आए विवाद ने कांग्रेस को बैकफुट पर ला दिया है। पार्टी को अब भाजपा से मुकाबला करने के साथ अपने भीतर उपजे असंतोष को शांत करने की दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। अंदरखाने यह चर्चा भी चल रही है कि कांग्रेस की आंतरिक खींचतान का राजनीतिक लाभ भाजपा को मिल सकता है। कुछ लोग इसके पीछे भाजपा की रणनीति होने का दावा कर रहे हैं, लेकिन इस संबंध में कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है।
दूसरी तरफ भाजपा से टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय चुनाव लड़ रहे नेताओं को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के एक वर्ग का कहना है कि भाजपा ने कुछ प्रभावशाली कार्यकर्ताओं को टिकट नहीं देकर उनके लिए निर्दलीय चुनाव लड़ने का रास्ता खुला छोड़ा है। ऐसे प्रत्याशियों को चुनावी चर्चाओं में भाजपा की कथित ‘बी टीम’ कहा जा रहा है। हालांकि भाजपा की ओर से इस तरह की किसी रणनीति की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
माना जा रहा है कि यदि भाजपा अपने दम पर स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर पाती है तो पार्टी की विचारधारा से जुड़े या भाजपा से बगावत कर चुनाव लड़ रहे निर्दलीय प्रत्याशी बोर्ड गठन में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। जीतने वाले ऐसे निर्दलीयों का समर्थन लेकर भाजपा नगर निगम में अपना बोर्ड बनाने का प्रयास कर सकती है। बाद में उनकी पार्टी में वापसी अथवा समर्थन की औपचारिक घोषणा भी संभावित राजनीतिक विकल्प हो सकती है।
फिलहाल सबकी नजर कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष की प्रतिक्रिया और पार्टी की अगली रणनीति पर टिकी है। कांग्रेस इस विवाद से निकलकर चुनावी माहौल को अपने पक्ष में कर पाती है या भाजपा निर्दलीयों के सहारे सत्ता का गणित साधती है, इसका फैसला चुनाव परिणाम के बाद ही होगा। इतना तय है कि इस बार बीकानेर नगर निगम का मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं, बल्कि निर्दलीय उम्मीदवारों की ताकत के इर्द-गिर्द भी घूमता दिखाई दे रहा है।

