ऊंट के स्टेम सेल से होगा थनैला रोग का इलाज!, एंटीबायोटिक-मुक्त उपचार की दिशा में एनआरसीसी का बड़ा कदम
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ऊंट के स्टेम सेल से होगा थनैला रोग का इलाज!, एंटीबायोटिक-मुक्त उपचार की दिशा में एनआरसीसी का बड़ा कदम

Sep 3, 2026

 

बीकानेर. ऊंट के स्टेम सेल अब दुधारू पशुओं में होने वाले थनैला रोग के एंटीबायोटिक-मुक्त उपचार का रास्ता खोल सकते हैं। भाकृअनुप-राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र (एनआरसीसी), बीकानेर को इस संबंध में महत्वपूर्ण अनुसंधान परियोजना की स्वीकृति मिली है। परियोजना में ऊंट के विभिन्न ऊतकों से स्टेम सेल प्राप्त कर थनैला रोग पर उनके संभावित प्रभाव, सुरक्षा और प्रभावशीलता का अध्ययन किया जाएगा।

 

 

इस परियोजना की जानकारी देने के लिए एनआरसीसी में गुरुवार को प्रेस वार्ता आयोजित की गई। केंद्र निदेशक डॉ. अनिल कुमार पूनिया ने बताया कि थनैला रोग दुधारू पशुओं के स्वास्थ्य, दुग्ध उत्पादन और पशुपालकों की आय से जुड़ी गंभीर समस्या है। इसके उपचार में एंटीबायोटिक के अत्यधिक इस्तेमाल से एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी दवाओं के प्रति रोगाणुओं की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने की चुनौती सामने आ रही है।

 

 

उन्होंने कहा कि स्टेम सेल आधारित अनुसंधान एंटीबायोटिक के विकल्प की तलाश में महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकता है। यदि अध्ययन में प्रभावी और सुरक्षित उपचार की संभावनाएं सामने आती हैं तो इससे ऊंटनियों का स्वास्थ्य एवं दुग्ध उत्पादन बनाए रखने के साथ पशुपालकों का आर्थिक नुकसान कम करने में मदद मिलेगी।

 

 

ऊंट के विभिन्न ऊतकों से प्राप्त किए जाएंगे स्टेम सेल

परियोजना के प्रधान अन्वेषक एवं केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रतन कुमार चौधरी ने बताया कि अनुसंधान के अंतर्गत ऊंट के विभिन्न ऊतकों से मेसेनकाइमल स्टेम सेल्स (एमएससी) प्राप्त कर उनकी विशेषताओं का अध्ययन किया जाएगा। प्रयोगशाला और प्रायोगिक मॉडल के माध्यम से थनैला रोग में इनके संभावित प्रभावों का मूल्यांकन होगा।

 

 

इसके बाद उपचार की सुरक्षा और प्रभावशीलता का प्रीक्लिनिकल अध्ययन किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि परियोजना का उद्देश्य भविष्य के लिए सुरक्षित, प्रभावी और एंटीबायोटिक-मुक्त वैकल्पिक उपचार विकसित करने की वैज्ञानिक संभावनाओं का पता लगाना है।

 

 

डॉ. चौधरी ने बताया कि एक अनुमान के अनुसार भारत में थनैला रोग के कारण प्रतिवर्ष करीब 13 हजार करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है। परियोजना सफल होने पर इस नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है। उन्होंने इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर से जुड़ा अनुसंधान प्रयास बताते हुए कहा कि इसके परिणाम भविष्य में व्यापक पशु चिकित्सा उपयोग की संभावनाएं खोल सकते हैं।

 

 

प्रभावित ऊंट पर सालाना 2,179 रुपये का आर्थिक भार

प्रधान वैज्ञानिक डॉ. राकेश रंजन ने बताया कि एनआरसीसी के अध्ययन में ऊंटों के क्लिनिकल थनैला रोग के कारण दवाओं, पशु चिकित्सा सेवाओं और दुग्ध उत्पादन में कमी से ऊंटपालकों को नुकसान होने की बात सामने आई है। अध्ययन के अनुसार एक प्रभावित ऊंट के कारण पालक पर औसतन करीब 2,179 रुपये का वार्षिक आर्थिक भार पड़ता है।

 

 

ऊंटों की घटती संख्या से जुड़े सवाल पर वैज्ञानिकों ने कहा कि संरक्षण के लिए ऊंट की उपयोगिता बढ़ाना आवश्यक है। इसके लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, मूल्य संवर्धित उत्पादों के विकास और ऊंट को ‘डेजर्ट की डेयरी’ के रूप में विकसित करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

 

 

प्रेस वार्ता में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी अखिल ठुकराल और वैज्ञानिक डॉ. श्रीशैलम उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन मुख्य तकनीकी अधिकारी नेमीचंद बारासा ने किया।