वार्ड आरक्षण के बाद अब ‘Gen Z’ की एंट्री: सोशल मीडिया पर टिकट की दावेदारी, क्या बिगड़ेगा बीकानेर का पुराना चुनावी गणित?
बीकानेर. नगर निगम चुनाव के लिए 80 वार्डों की आरक्षण लॉटरी निकलते ही बीकानेर की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। कुछ दावेदारों के वर्षों पुराने चुनावी सपनों को आरक्षण ने झटका दिया है तो कई नए चेहरों के लिए अचानक चुनाव लड़ने का रास्ता खुल गया है। बीकानेर नगर निगम के 80 वार्डों में 9 वार्ड अनुसूचित जाति और 16 वार्ड ओबीसी के लिए आरक्षित हुए हैं, जबकि 55 वार्ड सामान्य वर्ग के हिस्से आए हैं। इनमें अलग-अलग श्रेणियों में महिला आरक्षण भी शामिल है।
लेकिन वार्ड आरक्षण के बाद शुरू हुई चुनावी दौड़ में इस बार एक नया शब्द तेजी से चर्चा में आ रहा है—Gen Z।
शहर के अलग-अलग वार्डों में युवा चेहरे अब सोशल मीडिया के जरिए खुलकर अपनी दावेदारी सामने रखने लगे हैं। किसी की तस्वीर पार्टी के चुनाव चिन्ह के साथ दिखाई दे रही है तो कोई अपने सामाजिक कार्यों, क्षेत्र में सक्रियता और युवाओं की टीम के जरिए टिकट की दावेदारी मजबूत करने में लगा है। सोशल मीडिया पर बीकानेर नगर निगम चुनाव और संभावित प्रत्याशियों को लेकर पोस्ट और वीडियो सामने आने भी शुरू हो चुके हैं।
जंतर-मंतर के बाद Gen Z की क्यों बढ़ी चर्चा?
हाल में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए युवा आंदोलन ने देश की राजनीति में Gen Z की राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी को लेकर नई बहस खड़ी की। सोशल मीडिया से शुरू हुई युवाओं की लामबंदी सड़क तक पहुंची। इससे यह भी सामने आया कि नई पीढ़ी के लिए राजनीतिक संवाद का तरीका पुरानी पीढ़ियों से अलग है।
अब बीकानेर के निकाय चुनाव में सवाल यह है कि क्या यही डिजिटल ताकत स्थानीय राजनीति में भी वोट और टिकट में तब्दील हो पाएगी?
नगर निगम का चुनाव लोकसभा या विधानसभा से अलग होता है। यहां प्रत्याशी का व्यक्तिगत संपर्क, वार्ड में सक्रियता, जातीय-सामाजिक समीकरण, स्थानीय मुद्दे और मतदाताओं के साथ सीधा जुड़ाव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में केवल सोशल मीडिया पर लोकप्रियता टिकट या जीत की गारंटी नहीं होगी, लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी राजनीतिक दलों के लिए आसान नहीं रहेगा।
सोशल मीडिया पर शुरू हुई ‘टिकट की लड़ाई’
वार्ड आरक्षण घोषित होने के साथ ही फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म पर संभावित दावेदार सक्रिय होने लगे हैं। समर्थकों की ओर से फोटो, पोस्टर और दावेदारी से जुड़ी पोस्ट साझा की जा रही हैं।
कई युवा दावेदार अपने पसंदीदा राजनीतिक दल और उसके चुनाव चिन्ह के साथ स्वयं को संभावित उम्मीदवार के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं। हालांकि अंतिम फैसला राजनीतिक दलों की टिकट चयन प्रक्रिया के बाद ही होगा, लेकिन सोशल मीडिया के जरिए दावेदारी जताकर पार्टी नेतृत्व तक संदेश पहुंचाने की कोशिश शुरू हो चुकी है।
Gen Y को भी नजरअंदाज करना आसान नहीं
चुनावी चर्चा केवल Gen Z तक सीमित नहीं रहने वाली। Gen Y यानी मिलेनियल पीढ़ी भी स्थानीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रखती है। इस पीढ़ी के कई लोग पिछले वर्षों से राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, व्यापारिक संस्थाओं और वार्ड स्तर की गतिविधियों में सक्रिय हैं।
एक तरफ Gen Z के पास सोशल मीडिया की तेज पहुंच, नए मुद्दे और डिजिटल नेटवर्क है, वहीं Gen Y के पास अपेक्षाकृत अधिक राजनीतिक-सामाजिक अनुभव और स्थानीय नेटवर्क हो सकता है। ऐसे में दोनों पीढ़ियां टिकट वितरण के समीकरण में अपनी जगह बनाने की कोशिश करेंगी।
पार्टियों के सामने दोहरी चुनौती
भाजपा, कांग्रेस और दूसरे दलों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह रहेगा कि वे युवाओं की इस सक्रियता को वास्तविक वोट में कैसे बदलते हैं।
सिर्फ युवा प्रत्याशी उतारना ही पर्याप्त नहीं होगा। युवाओं से जुड़े रोजगार, शिक्षा, खेल, डिजिटल सुविधाएं, सफाई, सड़क, यातायात और शहर के विकास जैसे स्थानीय मुद्दों को चुनावी एजेंडे से जोड़ना भी महत्वपूर्ण होगा।
वहीं टिकट वितरण में पुराने कार्यकर्ताओं की दावेदारी भी मजबूत रहेगी। ऐसे में पार्टी के प्रति वर्षों से काम कर रहे कार्यकर्ता और पहली बार मजबूती से टिकट मांग रही नई पीढ़ी के बीच संतुलन बनाना दलों के लिए चुनौती बन सकता है।
क्या बीकानेर में समीकरण बदल पाएगी Gen Z?
इसका वास्तविक जवाब चुनाव परिणाम ही देगा। फिलहाल इतना जरूर है कि वार्ड आरक्षण के बाद बीकानेर की चुनावी राजनीति में नई पीढ़ी ने अपनी मौजूदगी दर्ज करानी शुरू कर दी है।
अब नजर टिकट वितरण पर रहेगी। कितने युवा चेहरों पर भाजपा-कांग्रेस सहित अन्य दल भरोसा जताते हैं और कितने युवा निर्दलीय मैदान में उतरते हैं, इससे तस्वीर और साफ होगी।
निकाय चुनाव की बिसात बिछने लगी है। पुराने दावेदार अपने अनुभव और संगठनात्मक पकड़ के सहारे मैदान में हैं तो नई पीढ़ी मोबाइल स्क्रीन से निकलकर चुनावी मैदान में अपनी जगह तलाश रही है।
पार्टियों के लिए युवा केवल प्रत्याशी नहीं, बड़ा वोट बैंक भी
राजनीतिक दलों की चुनौती सिर्फ युवा उम्मीदवार तलाशने तक सीमित नहीं होगी। सवाल यह भी है कि नई पीढ़ी को मतदान केंद्र तक कैसे पहुंचाया जाए और उसके समर्थन को वोट में कैसे बदला जाए।
युवाओं के लिए रोजगार, शिक्षा, खेल सुविधाएं, ट्रैफिक, सफाई, सड़कें, डिजिटल सेवाएं और बेहतर सार्वजनिक स्थान जैसे मुद्दे अहम हो सकते हैं। अगर कोई प्रत्याशी इन स्थानीय मुद्दों पर युवाओं के साथ संवाद स्थापित करता है तो सोशल मीडिया की पहुंच जमीनी समर्थन में बदल सकती है।
लेकिन यदि चुनावी सक्रियता केवल पोस्टर, रील और फोटो तक सीमित रही तो इसका मतों पर कितना असर होगा, यह अलग सवाल रहेगा।

