राजस्थान का एकमात्र महाराजा जो तीन बार लंदन के गोलमेज सम्मेलन में भाग ले चुके, भारतीय रियासतों का प्रतिनिधित्व किया
बीकानेर. राजस्थान में कई राजा महाराजा की वीर गाथा आपको सुनने को मिल जाएगी, लेकिन एक ऐसे महाराजा रहे है जिन्होंने लंदन में भारत का प्रतिनिधित्व किया है. हम बात कर रहे है बीकानेर के महाराजा गंगासिंह की. बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह जी ने लगातार तीन साल तक लंदन में आयोजित होने वाले गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया. यह राजस्थान के पहले और एकमात्र शासक थे जिन्होंने लगातार लंदन में प्रतिनिधत्व किया है. बीकानेर के राजकीय गंगा संग्रहालय में आज भी इनकी गोलमेज सम्मेलन में भाग लेते हुए तस्वीर प्रदर्शित है. जिसको देखने के लिए कई देशी और विदेशी सैलानी आते है.
महाराजा गंगा सिंह ने 1930, 1931, और 1932 में आयोजित लंदन के तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया था, जो भारतीय रियासतों के हितों का प्रतिनिधित्व करने में उनकी भागीदारी को महत्वपूर्ण बनाता है. वह एकमात्र राजस्थानी थे जिन्होंने तीनों सम्मेलनों में हिस्सा लिया.
1917 में लंदन से भारत लौटते समय उन्होंने रोम में एक ‘रोम नोट’ लिखा था, जिसमें ब्रिटिश सरकार से भारतीय जनता को ब्रिटिश साम्राज्य से जोड़ने के लिए उदार और सहानुभूतिपूर्ण कदम उठाने का आग्रह किया गया था.
राजकीय गंगा संग्रहालय की परिरक्षक सुमन ने बताया कि महाराजा गंगा सिंह जी बीकानेर के प्रसिद्ध महाराजा थे.पहले साल तो उन्होंने अखिल भारतीय संघ की तरफ से
भाग लिया था. दूसरी बार बीकानेर शासक के रूप में भाग लिया था. महाराजा गंगा सिंह जी का अंग्रेजों के काफी हितैषी रहे थे.
अंग्रेजो को यह अहसास हुआ था कि अब उनका राज बहुत दिन नहीं टिक सकेगा और उन्हें भारतीयों को भी सत्ता में हिस्सा देना पड़ेगा. इस लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए ब्रिटिश सरकार ने लंदन में गोल मेज सम्मेलनों का आयोजन शुरू किया। अंग्रेज़ सरकार द्वारा भारत में संवैधानिक सुधारों पर चर्चा के लिए 1930-32 के बीच सम्मेलनों की एक श्रृंखला के तहत तीन गोलमेज सम्मेलन आयोजित किये गए थे. ये सम्मलेन मई 1930 में साइमन आयोग द्वारा प्रस्तुत की गयी रिपोर्ट के आधार पर संचालित किये गए थे. भारत में स्वराज, या स्व-शासन की मांग तेजी से बढ़ रही थी. 1930 के दशक तक, कई ब्रिटिश राजनेताओं का मानना था कि भारत में अब स्व-शासन लागू होना चाहिए. हालांकि, भारतीय और ब्रिटिश राजनीतिक दलों के बीच काफी वैचारिक मतभेद थे, जिनका समाधान सम्मलेनों से नहीं हो सका.

