महापौर चुनाव में ‘कमल’ की कुछ पंखुड़ियां टूटीं!, भाजपा के साथ बताए जा रहे निर्दलीयों ने किया ‘खेला’?
Bikaner News Politics

महापौर चुनाव में ‘कमल’ की कुछ पंखुड़ियां टूटीं!, भाजपा के साथ बताए जा रहे निर्दलीयों ने किया ‘खेला’?

Sep 21, 2026

बीकानेर. नगर निगम के महापौर चुनाव में कांग्रेस ने न केवल अपना बोर्ड बना लिया, बल्कि भाजपा के सियासी समीकरणों में भी सेंध लगा दी। कांग्रेस प्रत्याशी अनिल कल्ला 50 वोट हासिल कर महापौर निर्वाचित हुए, जबकि भाजपा प्रत्याशी डॉ. सुरेंद्र सिंह शेखावत को केवल 30 वोट मिले। परिणाम के बाद शहर के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि महापौर चुनाव में ‘कमल’ की कुछ पंखुड़ियां टूट गईं और भाजपा के समर्थन में बताए जा रहे कुछ निर्दलीय पार्षदों ने आखिरी समय पर ‘खेला’ कर दिया।

 

 

नगर निगम में कांग्रेस के 42 और भाजपा के 27 पार्षद निर्वाचित हुए थे। कांग्रेस प्रत्याशी अनिल कल्ला को 50 वोट मिलने से माना जा रहा है कि पार्टी के सभी पार्षद एकजुट रहे और उन्हें आठ अतिरिक्त पार्षदों का समर्थन भी मिला। ये अतिरिक्त वोट निर्दलीयों के रहे या भाजपा खेमे में भी सेंध लगी, गुप्त मतदान होने के कारण इसकी आधिकारिक पुष्टि संभव नहीं है। हालांकि परिणाम ने भाजपा के रणनीतिकारों के दावों पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।

 

 

भाजपा की ओर से अपने 27 पार्षदों के साथ आठ निर्दलीय पार्षदों का समर्थन होने का दावा किया जा रहा था। इस हिसाब से भाजपा प्रत्याशी को करीब 35 वोट मिलने की उम्मीद थी, लेकिन मतगणना में डॉ. सुरेंद्र सिंह शेखावत को केवल 30 वोट मिले। यानी दावे और परिणाम के बीच पांच वोटों का अंतर रहा। इससे स्पष्ट है कि भाजपा जिन सभी निर्दलीयों को अपने साथ मानकर चल रही थी, उनमें से कई ने मतदान के दौरान पार्टी प्रत्याशी का साथ नहीं दिया।

 

मतदान के दौरान कांग्रेस और भाजपा की रणनीति भी अलग-अलग दिखाई दी। कांग्रेस के सभी पार्षद एक बस में सवार होकर नगर निगम पहुंचे। पार्षद एकजुटता का संदेश देते हुए साथ ही मतदान केंद्र के अंदर गए और मतदान किया। कांग्रेस नेताओं एवं कार्यकर्ताओं में शुरुआत से ही उत्साह दिखाई दिया।

 

 

दूसरी तरफ भाजपा ने मतदान के लिए अलग रणनीति अपनाई। पहले छह पार्षदों से मतदान करवाया गया और इसके बाद दो-दो पार्षदों को मतदान के लिए अंदर भेजा गया। इसके बावजूद भाजपा पार्षदों और नेताओं में अपेक्षित उत्साह नजर नहीं आया। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता भी मतदान के दौरान सक्रिय रूप से दिखाई नहीं दिए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि महापौर चुनाव के दौरान संगठन के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों की कम सक्रियता भी भाजपा के कमजोर प्रदर्शन का एक कारण हो सकती है।

 

 

मतदान से पहले भाजपा समर्थित बताए जा रहे निर्दलीय पार्षदों को बाउंसर और सुरक्षा व्यवस्था के बीच नगर निगम लाया गया था। उस समय भाजपा खेमे ने इसे अपनी मजबूती के रूप में पेश किया, लेकिन परिणाम आने के बाद इन्हीं निर्दलीय पार्षदों की भूमिका पर सबसे अधिक सवाल उठ रहे हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि सुरक्षा घेरे में लाए गए कुछ निर्दलीय पार्षदों ने मतदान के दौरान भाजपा के बजाय कांग्रेस प्रत्याशी का समर्थन कर दिया।

 

हालांकि मतदान गुप्त था, इसलिए किस पार्षद ने किस प्रत्याशी को वोट दिया, इसे प्रमाणित नहीं किया जा सकता। लेकिन आंकड़ों ने इतना जरूर स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस अपने पार्षदों को एकजुट रखने में सफल रही और अतिरिक्त समर्थन जुटाने में भी भाजपा से आगे निकल गई। इसके उलट भाजपा अपने दावे के मुताबिक निर्दलीय पार्षदों के वोट हासिल नहीं कर पाई।

 

 

हार के बाद भाजपा के अंदर रणनीति और नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगे हैं। बताया जा रहा है कि पार्टी के कुछ नेता हार की जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाल रहे हैं। कुल मिलाकर महापौर चुनाव में कांग्रेस की एकजुटता और रणनीति भाजपा पर भारी पड़ी। अनिल कल्ला ने 50 वोट के साथ महापौर की कुर्सी हासिल की