इस महाराजा से जुड़ा है भुजिया का नाम, 150 साल पुराना है स्वाद, कुछ ही बचे हैं कारीगर
आमतौर पर आपने कई आकार की भुजिया का स्वाद चखा होगा, लेकिन क्या आपने कभी राजघराने की भुजिया का स्वाद चखा है? अगर नहीं तो हम बताते है बीकानेर राजघराने में करीब 150 साल पहले भुजिया शुरुआत हुई थी. वैसे तो मोटे और मध्यम आकार की भुजिया सभी जगह मिल जाती है, लेकिन सबसे बारीक यानी सबसे छोटा भुजिया सिर्फ बीकानेर में मिलती है. बीकानेर अपने स्वाद और भुजिया के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है, लेकिन बीकानेर का डूंगर शाही भुजिया भी पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है और इस भुजिया की डिमांड भी बहुत ज्यादा रहती है.
दुकानदार संजय पुरोहित ने बताया कि डूंगर शाही भुजिया का नाम बीकानेर के महाराजा डूंगर सिंह जी के नाम से पड़ा. यह डूंगर शाही भुजिया 260 रुपए किलो बेच रहे है. इस भुजिया की खासियत है कि यह सबसे छोटे आकार की होती है. वे रोजाना 20 किलो डूंगर शाही भुजिया बनाते है और रोजाना यह बिक जाती है.
1877 में बीकानेर के महाराजा डूंगर सिंह के शासन के समय में जब वे बीकानेर से बाहर गए थे, तो उन्होंने यह भुजिया की रेसिपी देखी. तब उन्होंने अपने राजघराने के कारीगरों यानी रसोइयों को इस तरह के भुजिया बनाने की बात कही. इसके बाद कारीगरों ने यह भुजिया बनाई. इस भुजिया का स्वाद इतना अच्छा और स्वादिष्ट था कि इसका टेस्ट पूरी दुनिया में फैल गया. आजकल तो बड़े आकार यानी मोटी भुजिया बनने लग गए, लेकिन डूंगर शाही भुजिया बहुत कम लोग बनाते है. इस भुजिया को बनाने में बड़ी मेहनत लगती है और यह भुजिया हर किसी से बनता भी नहीं है. इस भुजिया को बनाने के लिए गिनती के ही कारीगर है. इस भुजिया को बनाने में करीब एक घंटे का समय लगता है. इस भुजिया को बनाने में मोठ, मोगर, मुंगफली का तेल, मसाले आदि से यह भुजिया बनाया जाता है. बता दें कि बीकानेर के 20वें महाराजा डूंगर सिंह थे जो 1872 से 1887 तक बीकानेर के महाराजा रहे थे.

