शुष्क क्षेत्रों में सतत कृषि और मृदा स्वास्थ्य पर किसान संगोष्ठी आयोजित
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शुष्क क्षेत्रों में सतत कृषि और मृदा स्वास्थ्य पर किसान संगोष्ठी आयोजित

May 8, 2026

 

बीकानेर. आईसीएआर-केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान (ICAR-CIAH), बीकानेर में गुरुवार को “शुष्क क्षेत्रों में सतत कृषि हेतु संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन एवं मृदा स्वास्थ्य” विषय पर एक दिवसीय किसान संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लेकर कृषि वैज्ञानिकों से मृदा स्वास्थ्य, संतुलित उर्वरक उपयोग, प्राकृतिक खेती और सतत कृषि तकनीकों की जानकारी प्राप्त की।

 

 

संगोष्ठी का आयोजन डॉ. एम. के. जाटव के संयोजन तथा डॉ. अनीता मीणा के सह-संयोजन में किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य शुष्क क्षेत्रों के किसानों को वैज्ञानिक खेती पद्धतियों, मृदा संरक्षण और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन के प्रति जागरूक करना था, ताकि सीमित संसाधनों में भी बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सके।

 

 

 

कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिकों ने रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मृदा उर्वरता में आ रही गिरावट, जैविक कार्बन की कमी और पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की जानकारी दी। किसानों को मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक उपयोग अपनाने की सलाह देते हुए बताया गया कि इससे आवश्यकतानुसार पोषक तत्वों का उपयोग कर लागत कम की जा सकती है और भूमि की उर्वरता लंबे समय तक बनाए रखी जा सकती है।

 

 

डॉ. अनीता मीणा ने “मृदा स्वास्थ्य कार्ड आधारित उर्वरक प्रबंधन” विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि वैज्ञानिक मृदा परीक्षण और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन आधुनिक कृषि की आवश्यकता है। उन्होंने किसानों को खेत से सही तरीके से मृदा नमूना लेने का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया। उन्होंने कहा कि संतुलित उर्वरक उपयोग से फसल उत्पादन बढ़ने के साथ भूमि की गुणवत्ता भी सुरक्षित रहती है।

 

 

उन्होंने प्राकृतिक एवं जैविक खेती के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ये पद्धतियां मृदा की संरचना सुधारने, जैविक कार्बन बढ़ाने और लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बनाए रखने में सहायक हैं।

 

 

डॉ. एम. के. जाटव ने समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (INM) पद्धतियों की जानकारी देते हुए कहा कि जैविक खाद, हरी खाद, ढैंचा फसल, जैव उर्वरक और रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग से उर्वरकों की बचत के साथ मृदा उर्वरता और फसल उत्पादकता में वृद्धि संभव है। उन्होंने बताया कि रबी फसलों में संतुलित उर्वरक उपयोग से खरीफ फसल में लगभग 25 प्रतिशत तक फॉस्फोरस उर्वरक की बचत की जा सकती है।

 

 

 

इस दौरान डॉ. बी. आर. चौधरी ने शुष्क क्षेत्रों में कुकुरबिटेसी वर्गीय फसलों की उन्नत उत्पादन तकनीकों और कम पानी में अधिक उत्पादन की संभावनाओं पर जानकारी दी। वहीं डॉ. धुरंदर सिंह ने खेजड़ी आधारित कृषि प्रणाली को पर्यावरण संरक्षण, पशुपालन सहायता और अतिरिक्त आय का प्रभावी माध्यम बताया।

 

 

कार्यक्रम के अंत में किसानों ने उर्वरक प्रबंधन, रोग नियंत्रण, सिंचाई व्यवस्था और फसल उत्पादन से जुड़े सवाल पूछे, जिनका वैज्ञानिकों ने विस्तार से समाधान किया। किसानों ने संस्थान का आभार जताते हुए भविष्य में भी ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की मांग की।