बीकानेर की मरु संस्कृति और विरासत में पर्यटन की अपार संभावनाएं, UNESCO सूची में शामिल कराने पर जोर
बीकानेर. अंतरराष्ट्रीय पर्यटन दिवस के अवसर पर बीकानेर में राजस्थान की मरु संस्कृति, इतिहास और पर्यटन को वैश्विक पहचान दिलाने को लेकर विशेष मंथन हुआ। राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान में आयोजित विशेष व्याख्यान में विशेषज्ञों ने बीकानेर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को पर्यटन से जोड़कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करने की आवश्यकता बताई।
राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, बीकानेर में पुरातत्त्व एवं संग्रहालय विभाग, बीकानेर तथा महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश, जोधपुर के संयुक्त तत्वावधान में ‘सुनी, लिखी, पढ़ी व्याख्यान श्रृंखला’ के तहत ‘राजस्थान की मरु संस्कृति विरासत, यात्रा पर्यटन एवं वैश्विक आकर्षण’ विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के पर्यटन, होटल, हॉस्पिटैलिटी एवं हेरिटेज स्टडीज विभाग के पूर्व समन्वयक प्रो. सैयद इनायत अली जैदी रहे। उन्होंने पर्यटन और इतिहास के आपसी संबंधों पर विस्तार से चर्चा की। 12वीं शताब्दी के साहित्यिक स्रोतों का उल्लेख करते हुए उन्होंने भारत में यात्रा और पर्यटन की सदियों पुरानी परंपरा तथा उसके विकास पर प्रकाश डाला।
बीकानेर में मरु पर्यटन की सर्वाधिक संभावनाएं
प्रो. जैदी ने कहा कि राजस्थान की मरु संस्कृति अपनी विशिष्ट परंपराओं, जीवनशैली और सांस्कृतिक विशेषताओं के कारण देश ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अलग पहचान रखती है। उन्होंने बीकानेर को मरु पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र बताते हुए यहां मौजूद ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों को पर्यटन की नई संभावनाओं से जोड़ने पर जोर दिया।
उन्होंने गजनेर, लक्ष्मीनाथ, लालगढ़, करणी माता कैमल फार्म और सागर छतरियों सहित बीकानेर के विभिन्न पर्यटन स्थलों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन स्थलों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विशेषताओं को योजनाबद्ध तरीके से पर्यटन विकास से जोड़ा जाए तो बीकानेर को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर और मजबूत पहचान मिल सकती है।
UNESCO विश्व विरासत सूची में शामिल कराने की जरूरत
प्रो. जैदी ने बीकानेर की समृद्ध ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत को UNESCO की विश्व विरासत सूची में स्थान दिलाने की दिशा में प्रयास करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि शहर की वास्तुकला, ऐतिहासिक स्थल, मरु संस्कृति, परंपराएं और जीवनशैली इसकी विशिष्ट पहचान हैं। इन्हें संरक्षित करने के साथ पर्यटन की दृष्टि से प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना जरूरी है।
उन्होंने पर्यटन को वैश्विक उद्योग बताते हुए कहा कि इसके अलग-अलग आयामों को समझने और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित करने की आवश्यकता है। पर्यटन विकास में उद्यमियों की भूमिका, नीतिगत प्रयासों और स्थानीय संस्कृति को पर्यटन से जोड़ने पर भी उन्होंने विचार रखे।
फूड टूरिज्म भी बन सकता है पहचान
युवा उद्यमी आशीष अग्रवाल ने बीकानेर के विशिष्ट खान-पान को शहर की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि बीकानेर की पारंपरिक खाद्य संस्कृति को पर्यटन से जोड़कर फूड टूरिज्म को विकसित किया जा सकता है।
विश्व पर्यटन दिवस 2026 की आधिकारिक थीम के संदर्भ में पर्यटन क्षेत्र में डिजिटल तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती भूमिका पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि डिजिटल माध्यमों के जरिए राजस्थान की मरु संस्कृति और डेजर्ट टूरिज्म को देश-दुनिया के पर्यटकों तक नए तरीके से पहुंचाया जा सकता है।
वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी डॉ. नितिन गोयल ने कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए आयोजन के उद्देश्य तथा बीकानेर की विरासत एवं पर्यटन के महत्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में डॉ. राजेन्द्र कुमार और संग्रहालयाध्यक्ष राकेश शर्मा की प्रमुख भूमिका रही। संचालन श्रीमती मोनिका गौड़ ने किया।
कार्यक्रम में आशीष अग्रवाल, कर्नल हिम सिंह, डॉ. मेघना शर्मा, डॉ. गिरिजा शंकर ओझा, डॉ. नासिर जैदी, राजाराम स्वर्णकार, अजय जोशी, राजेन्द्र जोशी, उमेश शर्मा, प्रेरणा महेश्वरी, नंदिनी अग्रवाल सहित शोधार्थी तथा इतिहास एवं संस्कृति के अध्येता उपस्थित रहे।

