अरावली से थार तक जैव-विविधता बचाने पर जोर, काचरी-केर-पीळू जैसी फसलों से बढ़ेगी किसानों की आय
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अरावली से थार तक जैव-विविधता बचाने पर जोर, काचरी-केर-पीळू जैसी फसलों से बढ़ेगी किसानों की आय

Sep 27, 2026

बीकानेर. थार के शुष्क इलाकों में उगने वाली देशज फसलें अब किसानों की आय बढ़ाने के साथ पोषण और रोजगार का भी बड़ा जरिया बन सकती हैं। काचरी, केर, पीळू और करोंदा जैसी कम उपयोग में आने वाली फसलों की पोषणीय, न्यूट्रास्यूटिकल और औषधीय संभावनाओं को पहचानकर इनके वैज्ञानिक उपयोग और मूल्य संवर्धन पर जोर देने की जरूरत है। यह बात कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के पूर्व सचिव एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व महानिदेशक पद्मभूषण डॉ. आर.एस. परोदा ने बीकानेर में कही।

 

 

भा.कृ.अनु.प.-केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान (ICAR-CIAH) के 34वें स्थापना दिवस समारोह का आयोजन रविवार को संस्थान परिसर में हुआ। कार्यक्रम में डॉ. परोदा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। राजस्थान पशुचिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. सुमंत व्यास और कृषि विश्वविद्यालय, कोटा की कुलगुरु प्रो. विमला ढुकवाल विशिष्ट अतिथि रहे। ICAR-राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. अनिल पूनिया और संस्थान के संस्थापक निदेशक डॉ. ओ.पी. पारीक विशेष अतिथि के रूप में मौजूद रहे।

 

 

1993 से अब तक की शोध यात्रा सामने रखी

संस्थान निदेशक डॉ. विश्वबंधु पटेल ने ICAR-CIAH की वर्ष 1993 से अब तक की वैज्ञानिक एवं तकनीकी यात्रा प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि शुष्क क्षेत्र की जैव-विविधता का संरक्षण, देशज और कम उपयोग में आने वाली फसलों पर शोध, गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, टिश्यू कल्चर, उन्नत किस्मों, जैव-तकनीकी हस्तक्षेप और मूल्य संवर्धन संस्थान की प्रमुख प्राथमिकताएं हैं।

 

 

समारोह में संस्थान की ओर से तैयार 25 शोध प्रकाशनों का विमोचन भी किया गया। मुख्य अतिथि डॉ. आर.एस. परोदा ने संस्थान परिसर में टिश्यू कल्चर से तैयार खजूर के पौधे का रोपण किया।

 

 

फसल विविधीकरण से किसानों की आय बढ़ाने पर जोर

डॉ. परोदा ने कहा कि शुष्क क्षेत्रों की कृषि को टिकाऊ और लाभकारी बनाने के लिए फसल विविधीकरण जरूरी है। फल, सब्जी, देशज फसलों और पशुधन आधारित एकीकृत कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देकर किसानों की आय में वृद्धि की जा सकती है।

 

 

उन्होंने बदलती जलवायु परिस्थितियों को देखते हुए जलवायु-सहिष्णु फसल किस्मों के विकास और देशज पौधों के संरक्षण पर जोर दिया। साथ ही अनुसंधान को किसानों की वास्तविक समस्याओं और बाजार से जोड़ने की आवश्यकता बताई। एफपीओ, स्वयं सहायता समूहों और उद्यमियों के माध्यम से कृषि तकनीकों के व्यावसायीकरण पर भी जोर दिया गया।

 

 

जैतून की खेती को लेकर भी मंथन

स्थापना दिवस समारोह में ‘विकसित भारत 2047 के लिए शुष्क बागवानी की जलवायु-अनुकूलन क्षमता’ विषय पर विचार-मंथन सत्र आयोजित हुआ। इसमें वैज्ञानिकों और किसानों ने शुष्क क्षेत्र में जलवायु-सहिष्णु उत्पादन प्रणाली, पारंपरिक फसलों के पुनर्स्थापन, जल संरक्षण, फसल विविधीकरण, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर चर्चा की।

 

 

राजस्थान में जैतून की खेती के पुनर्स्थापन और विस्तार को लेकर भी तकनीक और उत्पादन रणनीतियों पर विचार किया गया। वैज्ञानिकों और किसानों के बीच संवाद में पानी की उपलब्धता, फसल एवं किस्म चयन, तकनीक अपनाने, उत्पादन की स्थिरता और बाजार से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा हुई।

 

 

डॉ. मुकेश बेरवाल ने बताया कि समारोह में संस्थान के वैज्ञानिकों, तकनीकी एवं प्रशासनिक अधिकारियों-कर्मचारियों के साथ पूर्व निदेशक, कृषि वैज्ञानिक, विद्यार्थी, किसान प्रतिनिधि तथा विभिन्न कृषि एवं पशु चिकित्सा विश्वविद्यालयों और विभागों के अधिकारी शामिल हुए। समारोह में वर्ष 1993 से 2026 तक संस्थान की वैज्ञानिक यात्रा के साथ आने वाले वर्षों के लिए शुष्क बागवानी की नई शोध प्राथमिकताओं पर भी मंथन हुआ।

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