लोकगीत हमारी सांस्कृतिक विरासत के संवाहक : प्रो. अन्नाराम शर्मा
बीकानेर. राजस्थानी लोकगीत हमारी सांस्कृतिक विरासत, पारिवारिक आत्मीयता और लोकजीवन की परंपराओं के सशक्त संवाहक हैं। लोकगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होने वाली सांस्कृतिक स्मृतियों और जीवन मूल्यों को सहेजने का जरिया भी हैं। यह बात राजकीय डूंगर महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के केंद्रीय लोक साहित्य प्रमुख प्रो. अन्नाराम शर्मा ने शनिवार को बीकानेर के बेसिक महाविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में कही।
स्थानीय बेसिक महाविद्यालय में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की नगर इकाई, बीकानेर के तत्वावधान में ‘प्राक् लोक मंथन’ कार्यक्रम के तहत ‘भात में बीरा गायन’ का आयोजन किया गया। इसमें राजस्थानी लोकगीतों की समृद्ध परंपरा को सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया। लोक गायिकाओं ने पारंपरिक गीतों के माध्यम से राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत और लोकजीवन की आत्मीयता को अभिव्यक्त किया।
लोक संस्कृति में समाहित हैं जीवन के मूल्य
कार्यक्रम में विषय प्रवर्तन करते हुए प्रो. अन्नाराम शर्मा ने कहा कि लोक भारत की आत्मा है और देश की पहचान उसकी विविधतापूर्ण लोक संस्कृति से भी बनती है। गांव, कस्बे, मेले, सोलह संस्कार, ऋतुएं, पशु-पक्षी, त्योहार, लोकगीत, लोकनृत्य, लोकभाषाएं और लोकाचार भारतीय जीवनोत्सव को साकार करते हैं।
उन्होंने कहा कि भारतीय लोक संस्कृति में परंपरा और व्यवहार, आध्यात्मिकता और प्रकृति के साथ मानव जीवन का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। लोक संस्कृति में सरलता, सहिष्णुता, करुणा, परिश्रम, आस्था और पारिवारिक आत्मीयता जैसे जीवन मूल्य समाहित हैं। लोकगीत इन मूल्यों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जयपुर में 4 से 6 दिसंबर तक होगा लोकमंथन
प्रो. शर्मा ने बताया कि यह आयोजन ‘प्राक् लोकमंथन-2026’ के अंतर्गत किया गया। लोकमंथन राष्ट्रीय स्तर का वैचारिक विमर्श मंच है, जहां विभिन्न क्षेत्रों के विद्वान, शिक्षाविद्, साहित्यकार, वैज्ञानिक, इतिहासकार, शोधार्थी और सामाजिक कार्यकर्ता समकालीन विषयों पर भारतीय दृष्टिकोण से विचार-विमर्श करते हैं।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2016 में भोपाल से शुरू हुई लोकमंथन की यात्रा रांची, गुवाहाटी और भाग्यनगर तक पहुंची है। इसी क्रम में आगामी 4 से 6 दिसंबर 2026 तक जयपुर में लोकमंथन का आयोजन प्रस्तावित है। इस वर्ष का ध्येय वाक्य ‘हम भारत के लोग’ रखा गया है।
उन्होंने कहा कि लोकमंथन का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनर्पाठ करना, रचनात्मक संवाद को प्रोत्साहित करना और नई पीढ़ी को भारतीय चिंतन से जोड़ना है। स्थानीय लोक परंपराओं और कलाकारों को मंच प्रदान करना भी इसी उद्देश्य का हिस्सा है।
भात और मायरा की परंपरा पर हुई चर्चा
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ठाकुर दास ने लोकगीतों के विविध रूपों और उनकी सांस्कृतिक महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने राजस्थान की पारिवारिक परंपराओं में ‘भात’ और ‘मायरा’ के महत्व को बताते हुए कहा कि लोकगीतों में भाई-बहन के अटूट प्रेम, पारिवारिक आत्मीयता और सामाजिक संबंधों की भावनाएं सहज रूप में अभिव्यक्त होती हैं।
कार्यक्रम का संयोजन डॉ. राजश्री भाटी ने किया। उनके साथ विनोद तंवर, सुधा आचार्य, डॉ. शशि बेसरवारिया, सरिता गहलोत सहित अन्य लोक गायिकाओं ने ठेठ राजस्थानी भाषा में पारंपरिक गीत प्रस्तुत किए। महाविद्यालय की डीएलएड की छात्राओं ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया। गीतों की प्रस्तुतियों ने राजस्थान की समृद्ध लोक परंपराओं और पारिवारिक रिश्तों की आत्मीयता का चित्र प्रस्तुत किया।
लोक गायिकाओं का किया सम्मान
कार्यक्रम की अध्यक्षता बेसिक महाविद्यालय के निदेशक रामजी व्यास ने की। उन्होंने प्रो. अन्नाराम शर्मा को गीतों की पुस्तक भेंट की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि महाविद्यालय लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए निरंतर प्रयासरत है। ऐसे आयोजन विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ संस्थान की सांस्कृतिक चेतना को भी समृद्ध करते हैं।
इस अवसर पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की ओर से उपस्थित लोक गायिकाओं का दुपट्टा ओढ़ाकर स्वागत एवं सम्मान किया गया। कार्यक्रम में महाविद्यालय के अकादमिक एवं व्यावसायिक अनुशासन से जुड़े छात्र-छात्राओं ने भी सहभागिता की।
कार्यक्रम का संचालन राजकीय डूंगर महाविद्यालय की व्याख्याता डॉ. छाया शर्मा ने किया। अंत में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के संभाग सह-संयोजक डॉ. मूलचंद बोहरा ने आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर बसंती हर्ष, डॉ. श्रीनिवास शर्मा, मोनिका गौड़ और मधुरिमा सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।
‘भात में बीरा गायन’ कार्यक्रम ने राजस्थानी लोकगीतों की जीवंत परंपरा को मंच प्रदान करने के साथ नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का संदेश दिया। कार्यक्रम में इस बात पर जोर रहा कि लोक परंपराओं का संरक्षण केवल अतीत को सहेजना नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक चेतना को भविष्य तक पहुंचाना भी है।

